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छोटे बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ की अपनी दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ होती है. अपना ग़à¥à¤¸à¥à¤¸à¤¾, खà¥à¤¶à¥€, दà¥à¤– तकलीफ़ बताने का उनका अपना तरीक़ा होता है. उनके कà¥à¤› इशारे तो हम समठलेते हैं और उनकी कैफ़ियत का अंदाज़ा लगा लेते हैं. लेकिन ये अंदाज़े हमेशा सटीक नहीं बैठते.
नतीजा ये कि बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ का रोना और तेज़ हो जाता है. वो बार-बार ग़à¥à¤¸à¥à¤¸à¤¾ करने लगते हैं.
अकà¥à¤¸à¤° बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ की ज़िद, फ़रमाइशें और रोना-धोना सà¥à¤¨à¤•र हम सोचते हैं कि काश हम इन बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ की अनकही बातें समठपाते.
अब साइंस आपकी मदद करने की कोशिश कर रही है, ताकि आप अपने बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ की बातों और इशारों को अचà¥à¤›à¥‡ से समठसकें.
कई देशों में बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ का मिज़ाज समà¤à¤¨à¥‡ के लिठबेबीलैब खà¥à¤² गई हैं. जहां उन बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ पर रिसरà¥à¤š की जा रही है, जिनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने बोलना नहीं सीखा है. जो सिरà¥à¤«à¤¼ रोना, हंसना या इशारे करना जानते हैं.
बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ के दिमाग में कà¥à¤¯à¤¾ चल रहा है
इस तकनीक की मदद से बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ के लिठà¤à¤• कैप तैयार की गयी है, जिसमें कई तरह के उपकरण और लाइटà¥à¤¸ लगी हैं. देखने में ये कैप सà¥à¤µà¤¿à¤®à¤¿à¤‚ग कैप की तरह लगती है.
तजà¥à¤°à¥à¤¬à¥‡ के दौरान ये कैप बचà¥à¤šà¥‡ को पहना दी जाती है. इसमें लगी लाइटà¥à¤¸ की तरंगें हडà¥à¤¡à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के ज़रिठसे बचà¥à¤šà¥‡ के दिमाग में जाती हैं और बचà¥à¤šà¥‡ के खून में घà¥à¤² जाती हैं. कैप का डिज़ाइन बचà¥à¤šà¥‡ के आराम को ज़हन में रखकर तैयार किया गया है. इसे पहनने से बचà¥à¤šà¥‡ को तकलीफ़ नहीं होती.
हालांकि ये किताब बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ के ज़हन को समà¤à¤¨à¥‡ के लिठबहà¥à¤¤ मददगार नहीं है, कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि इसमें कई à¤à¤¸à¥€ बातें हैं, जो बहà¥à¤¤ से बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ के बरà¥à¤¤à¤¾à¤µ पर सही नहीं बैठतीं. लेकिन इस किताब ने बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ के ज़हन के काम करने के तरीक़े पर रिसरà¥à¤š का रासà¥à¤¤à¤¾ हमवार किया.
हरेक रिसरà¥à¤š à¤à¤• क़दम आगे बेहतरी की ओर बढ़ी. हालांकि अà¤à¥€ तक कोई à¤à¥€ रिसरà¥à¤š आख़िरी पड़ाव पर पहà¥à¤‚चने का दावा करने वाली साबित नहीं हà¥à¤ˆ है.
मिसाल के लिठउनà¥à¤¨à¥€à¤¸à¤µà¥€à¤‚ और बीसवीं सदी तक वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤• यही मानते थे कि बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ को जज़à¥à¤¬à¤¾à¤¤à¥€ तकलीफ़ नहीं होती. कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि उनका ज़हन इतना विकसित नहीं होता कि वो इसे महसूस कर सकें.
बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ के सोचने का नà¥à¤¯à¥‚रल कनेकà¥à¤¶à¤¨
रिसरà¥à¤š के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° बचà¥à¤šà¥‡ के दिमाग में हर सेकेंड में दस लाख से à¤à¥€ ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ नठनà¥à¤¯à¥‚रल कनेकà¥à¤¶à¤¨ बनते रहते हैं. यानी बचà¥à¤šà¥‡ का दिमाग़ हर समय वà¥à¤¯à¤¸à¥à¤¤ रहता है. लेकिन वà¥à¤¯à¤¸à¥à¤¤ दिमाग़ का ये हिसà¥à¤¸à¤¾ छिपा रहता है. बचà¥à¤šà¥‡ के दिमाग़ के काम का तरीक़ा फ़िलॉसफ़ी और साइंस का मिकà¥à¤¸à¤šà¤° है.
साल 2000 की शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ में बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ की आंख की पà¥à¤¤à¤²à¥€ घूमने पर रिसरà¥à¤š की गई. इस रिसरà¥à¤š से पता चला कि बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ का दिमाग़ समà¤à¤¨à¥‡ के लिठअà¤à¥€ बहà¥à¤¤ काम करना बाकी है. उनकी सोच आसनी से नहीं समà¤à¥€ जा सकती.
बचà¥à¤šà¥‡ जिस वकà¥à¤¤ ख़ामोशी से कोई बात सà¥à¤¨ रहे होते हैं, उस वक़à¥à¤¤ à¤à¥€ उनका दिमाग़ लगातार काम करता रहता है. खास तौर से कान के पीछे वाला हिसà¥à¤¸à¤¾ उस समय सबसे ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ सकà¥à¤°à¤¿à¤¯ हो जाता है. दिमाग के इस हिसà¥à¤¸à¥‡ को 'सोशल बà¥à¤°à¥‡à¤¨' कहते हैं.
वयसà¥à¤•ों में दिमाग़ के इस हिसà¥à¤¸à¥‡ पर सबसे ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ रिसरà¥à¤š की गई है लेकिन बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ को लेकर वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤•ों को अà¤à¥€ कामयाबी नहीं मिली है.
रिसरà¥à¤š से मां-बाप का रोल कम हो जाà¤à¤—ा
रिसरà¥à¤šà¤° ये जानने का à¤à¥€ पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ कर रहे हैं कि हर बचà¥à¤šà¥‡ में दिमाग़ का विकास à¤à¤• जैसा कà¥à¤¯à¥‹à¤‚ नहीं होता. अपने माहौल से वो कौन सी चीज़ें सबसे पहले सीखते हैं. वो ये कैसे तय करते हैं कि कौन सी चीज़ उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ कब और कà¥à¤¯à¥‹à¤‚ ज़ाहिर करनी है.
जानकार कहते हैं कि बचà¥à¤šà¥‡ अपने आस-पास के माहौल से सबसे ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ सीखते हैं. लेकिन उनके आसपास के लोग कब कैसा वà¥à¤¯à¤µà¤¹à¤¾à¤° करेंगे कहना मà¥à¤¶à¥à¤•िल है. इससे बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ के सीखने के अमल पर à¤à¥€ बà¥à¤°à¤¾ असर पड़ता है.
रिसरà¥à¤šà¤° अपनी रिसरà¥à¤š के दौरान बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ के मां-बाप को बहà¥à¤¤ सी हिदायतें देते हैं. पर, उससे à¤à¥€ बहà¥à¤¤ मदद नहीं मिल पाती. इसीलिठà¤à¤¸à¥€ तकनीक और उपकरण बनाने पर काम चल रहा है जिसकी मदद से रिसरà¥à¤š में आसानी हो और बचà¥à¤šà¥‡ पर की जा रही रिसरà¥à¤š में मां-बाप का रोल कमतर हो जाà¤.
बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ के जनà¥à¤® को लेकर तीन ग़लतफ़हमियां
जानें याददाशà¥à¤¤ बढ़ाने और सफल होने का नà¥à¤¸à¥à¤–ा
बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ का दिमाग, रिसरà¥à¤š, विजà¥à¤žà¤¾à¤¨, मेडिकल रिसरà¥à¤š, टेकà¥à¤¨à¥‰à¤²à¥‰à¤œà¥€, बचà¥à¤šà¥‡
चार से छह महीने तक ऑटिज़à¥à¤® का डर
रिसरà¥à¤š बताती हैं कि पैदा होने के à¤à¤• दिन बाद ही बचà¥à¤šà¥‡ का सोशल दिमाग काम करना शà¥à¤°à¥‚ कर देता है. और चार से छह महीने के बचà¥à¤šà¥‡ में ऑटिज़à¥à¤® की बीमारी होने डर ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ होता है.
हालांकि जब तक बचà¥à¤šà¥‡ दो या तीन साल के नहीं हो जाते, कह पाना मà¥à¤¶à¥à¤•िल होता है कि वो ऑटिज़à¥à¤® का शिकार हैं या नहीं. कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि इस उमà¥à¤° के बाद ही उनके बरà¥à¤¤à¤¾à¤µ से इशारे मिलने शà¥à¤°à¥‚ होते हैं कि वो दूसरे बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ से अलग कà¥à¤¯à¥‹à¤‚ हैं.
बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ का दिमाग समà¤à¤¨à¥‡ के लिठà¤à¤®à¤†à¤°à¤†à¤ˆ सà¥à¤•ैनर का à¤à¥€ सहारा लिया जाता है. लेकिन à¤à¤¨à¤†à¤ˆà¤†à¤°à¤à¤¸ ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ बेहतर और ससà¥à¤¤à¥€ तकनीक है. ससà¥à¤¤à¥€ होने की वजह से ग़रीब देशों में à¤à¥€ रिसरà¥à¤š के लिठइस तकनीक का सहारा लिया जा सकता है.
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